नालियों के कचरे में दफन है 'स्वच्छ भारत' का दावा
प्रलभ शरण चौधरी | Truth India Times
बांदा। बुंदेलखंड के बांदा जनपद अंतर्गत कमासिन विकासखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो उत्तर प्रदेश के ग्रामीण स्वच्छता दावों की पोल खोलती है। ग्राम पंचायत कमासिन के दांदौ तिराहे से दांदौ मार्ग पर पिछले कई दिनों से नालियां चोक होने के कारण गंदा पानी सड़कों पर सैलाब बनकर बह रहा था। हालांकि, ग्रामीणों के आक्रोश और शिकायत के बाद प्रधान प्रतिनिधि ने जेसीबी लगवाकर सफाई तो करवा दी है, लेकिन यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि आखिर नालियां इस कदर जाम ही क्यों हुईं और क्या यह समाधान स्थायी है?
मुख्य मार्ग या गंदगी का दरिया?
कमासिन कस्बे का दांदौ मार्ग कोई आम रास्ता नहीं है। यह एक प्रमुख मार्ग है जहाँ से प्रतिदिन हजारों की संख्या में राहगीर, व्यापारी और विशेष रूप से छात्र-छात्राएं गुजरते हैं। लगभग 600 मीटर तक फैली नालियां इस कदर गंदगी और प्लास्टिक कचरे से पट गई थीं कि घरों से निकलने वाला निस्तारित जल सड़कों पर जमा होने लगा।
पैदल चलने वाले लोगों के लिए स्थिति यह थी कि उन्हें कीचड़ और बदबूदार पानी के बीच से होकर गुजरना पड़ रहा था। जब भी कोई तेज़ रफ्तार वाहन वहां से गुजरता, तो गंदा पानी राहगीरों के कपड़ों पर पड़ता, जिससे आए दिन विवाद की स्थिति बनी रहती थी।
ग्रामीणों का धैर्य टूटा, तब जागा तंत्र
स्थानीय निवासी जयनरायन द्विवेदी, नीरज गुप्ता, विजय गुप्ता, ऊधौ सिंह और लक्ष्मी प्रसाद ने जब देखा कि समस्या लाइलाज होती जा रही है, तब उन्होंने ग्राम प्रधान प्रतिनिधि अरविंद गुप्ता को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। ग्रामीणों का आरोप था कि नियमित सफाई न होने के कारण गाद (सिल्ट) जमा होती गई और अंततः ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह फेल हो गया।
सूचना मिलने पर प्रधान प्रतिनिधि अरविंद गुप्ता ने मौके पर पहुँचकर स्थिति का जायजा लिया और आनन-फानन में जेसीबी मशीन मंगवाई। घंटों की मशक्कत के बाद नालियों को खोला गया और ट्रैक्टर-ट्रॉली से कचरे को कस्बे से दूर फिंकवाया गया। तब जाकर कहीं सड़क का ‘कलेवर’ साफ हुआ और राहगीरों ने राहत की सांस ली।
जवाबदेही: क्या हर बार शिकायत का ही इंतजार होगा?
यह घटना विकासखंड प्रशासन और पंचायत राज विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। ‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ प्रशासन से सीधे कुछ सवाल पूछता है:
- नियमित सफाई का अभाव: क्या ग्राम पंचायतों में सफाई कर्मियों की तैनाती केवल कागजों पर है? यदि नालियों की साप्ताहिक सफाई होती, तो 600 मीटर का हिस्सा पूरी तरह चोक कैसे हो गया?
- प्लास्टिक और कचरा प्रबंधन: नालियों में जो भारी मात्रा में प्लास्टिक कचरा निकला, वह इस बात का सबूत है कि कस्बे में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट (ठोस कचरा प्रबंधन) की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार की ‘कचरा मुक्त गांव’ योजना यहाँ धरातल पर क्यों नहीं दिखती?
- इंजीनियरिंग की खामी: अक्सर देखा गया है कि नालियों का ढाल (Slope) सही न होने के कारण पानी रुक जाता है। क्या इस मार्ग की नालियों का निर्माण तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ है?
अस्थायी समाधान बनाम स्थायी संकट
स्थानीय निवासी लक्ष्मी प्रसाद का कहना है कि प्रधान प्रतिनिधि ने त्वरित कार्रवाई कर तत्काल राहत तो दे दी है, लेकिन यह समस्या फिर से पैदा होगी। जब तक कस्बे के जल निकासी के लिए कोई मास्टर प्लान नहीं बनेगा और नालियों को ढकने की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक कूड़ा गिरता रहेगा और नालियां जाम होती रहेंगी।
बांदा जिला प्रशासन को यह समझना होगा कि विकास केवल सड़कों के निर्माण से नहीं, बल्कि उनके रखरखाव और स्वच्छता से तय होता है। कमासिन की यह समस्या उन सैकड़ों गांवों की कहानी है जहाँ बजट तो आता है, लेकिन सफाई व्यवस्था ठेकेदारी और लापरवाही की भेंट चढ़ जाती है।
निष्कर्ष: जवाबदेही तय होनी चाहिए
कमासिन विकासखंड के अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सफाई कर्मी अपने आवंटित क्षेत्रों में नियमित रूप से कार्य करें। जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली जेसीबी मशीनों का उपयोग ‘आपातकाल’ के बजाय ‘निवारक’ (Preventive) सफाई के लिए होना चाहिए।
आज तो प्रधान प्रतिनिधि ने सक्रियता दिखाई, लेकिन क्या बांदा का जिला प्रशासन ऐसे स्थायी इंतजाम करेगा कि भविष्य में किसी छात्र को स्कूल जाने के लिए गंदे पानी से न गुजरना पड़े? जवाब का इंतजार कमासिन की जनता को है।
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