सरकारी विभागों ने डकारे बिजली विभाग के 57 करोड़
प्रलभ शरण चौधरी | ट्रुथ इंडिया टाइम्स
कन्नौज। नियम और कानून क्या सिर्फ आम आदमी की जेब ढीली करने के लिए बने हैं? क्या सरकारी कुर्सी पर बैठते ही ‘बिल’ भरने की नैतिकता खत्म हो जाती है? कन्नौज जिले से सामने आए आंकड़े तो यही गवाही दे रहे हैं। जहां एक तरफ बिजली विभाग आम नागरिकों का बिल कुछ हजार होते ही ‘आरसी’ काटने और कनेक्शन काटने की धमकी देने पहुंच जाता है, वहीं जिले के रसूखदार सरकारी महकमे करोड़ों रुपये की बिजली ‘मुफ्त’ में डकार रहे हैं। जिले के विभिन्न विभागों पर बिजली विभाग का कुल 57 करोड़ 4 लाख 55 हजार 667 रुपये का भारी-भरकम बकाया है। हैरानी की बात यह है कि कई विभागों ने तो कनेक्शन लेने के बाद से आज तक सरकार के खाते में फूटी कौड़ी भी जमा नहीं की है।
शिक्षा और आंगनबाड़ी केंद्र: बकाए के ‘बादशाह’
बिजली विभाग द्वारा दी गई जानकारी में सबसे ऊपर शिक्षा विभाग और आंगनबाड़ी केंद्र हैं। जिले के लगभग 160 सरकारी प्राइमरी स्कूलों ने शिक्षा के उजाले के नाम पर 37 करोड़ 56 लाख रुपये से अधिक का बिल दबा रखा है। वहीं, 440 आंगनबाड़ी केंद्रों की हालत और भी खराब है, जिन पर 9 करोड़ 27 लाख रुपये का बकाया है। इन केंद्रों पर बिजली तो धड़ल्ले से जल रही है, लेकिन जब भुगतान की बात आती है, तो जिम्मेदार अधिकारी ‘बजट नहीं है’ का रोना रोकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
कलेक्ट्रेट से लेकर पुलिस विभाग तक सब ‘बकाएदार’
इस फेहरिस्त में जिले की प्रशासनिक धुरी माने जाने वाले कार्यालय भी शामिल हैं। सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले पुलिस विभाग के 25 कनेक्शनों पर 1 करोड़ 98 लाख रुपये का बिल लंबित है। वहीं, न्याय और प्रशासन का मंदिर कहे जाने वाले कलेक्ट्रेट भवन (तहसील व कैंप ऑफिस) पर 70 लाख और विकास भवन पर 44 लाख रुपये बकाया हैं। शहर की व्यवस्था संभालने वाली नगर पालिका खुद 20 लाख रुपये की कर्जदार बनी बैठी है।
प्रमुख विभागों की ‘उधारी’ एक नजर में: |
विभाग का नाम | बकाया राशि (रुपये में) |
| प्राइमरी स्कूल (160) | 37 करोड़ 56 लाख |
| आंगनबाड़ी केंद्र (440) | 9 करोड़ 27 लाख |
| सामुदायिक शौचालय (145) | 3 करोड़ 28 लाख |
| पंचायत भवन (141) | 3 करोड़ 27 लाख |
| पुलिस विभाग (25 कनेक्शन) | 1 करोड़ 98 लाख |
| कलेक्ट्रेट (तहसील/कैंप ऑफिस) | 70 लाख |
| विकास भवन | 44 लाख |
इसके अलावा पीडब्ल्यूडी (19.12 लाख), जल निगम (8 लाख), नलकूप विभाग (8.36 लाख) और राजकीय पॉलिटेक्निक (4.55 लाख) भी इसी कतार में शामिल हैं।
नोटिस पर नोटिस, पर नतीजा ‘सिफर’
बिजली विभाग के अधिशासी अभियंता मगन सिंह ने बताया कि इन सभी विभागों को कई बार नोटिस भेजे जा चुके हैं। शासन स्तर पर भी पत्राचार किया गया है। लेकिन वसूली के नाम पर सरकारी विभागों के आगे बेबस है।
‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ के तीखे सवाल:
- क्या बिजली विभाग में इतनी हिम्मत है कि वह कलेक्ट्रेट या विकास भवन का कनेक्शन काट सके?
- गरीब किसान का बिल बकाया होने पर जो फुर्ती दिखाई जाती है, वो इन ‘बड़े साहबों’ के मामले में कहां गायब हो जाती है?
- क्या इन विभागों को मिलने वाले बजट में बिजली बिल का प्रावधान नहीं होता, या फिर उस बजट का कहीं और ‘समायोजन’ कर लिया जाता है?
जनता देख रही है कि कैसे नियम सिर्फ उनके लिए हैं, जबकि सरकारी तंत्र खुद करोड़ों के कर्ज में डूबा हुआ सफेद हाथी बना बैठा है।
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