कानपुर में सत्ता की हनक या ‘गुंडाराज’? खुद को भाजपा नेता बताकर दुकान में पी शराब; मना करने पर दुकानदार को पीटा, जमकर की तोड़फोड़!

कानपुर (कल्याणपुर)। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि “अपराधी या तो जेल में होंगे या प्रदेश छोड़ देंगे”, लेकिन कानपुर के कल्याणपुर में इसके उलट तस्वीर नजर आ रही है। यहाँ भगवा गमछे और ‘भाजपा नेता’ के नाम का खौफ दिखाकर एक युवक ने सरेआम गुंडागर्दी की। केशवपुरम इलाके में एक स्मोक जोन सेंटर के भीतर न केवल अवैध रूप से शराब पी गई, बल्कि टोकने पर दुकानदार की बेरहमी से पिटाई कर दुकान में तोड़फोड़ की गई। पूरी वारदात CCTV में कैद हो चुकी है, जो पुलिस की सुरक्षा और ‘रामराज्य’ के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।

वारदात: “पानी लाओ, यहीं शराब पिएंगे”

घटना बुधवार देर रात करीब 1:00 बजे की है। जब ‘दा पान शॉप एंड स्मोकिंग जोन’ के संचालक अंकित अपनी दुकान बढ़ाकर घर जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी इलाके का रसूखदार मनीष दुबे अपने साथियों के साथ वहां पहुँचा। आरोप है कि मनीष ने पहले पानी मांगा और फिर दुकान के भीतर ही बैठकर शराब पीना शुरू कर दिया। जब दुकानदार अंकित ने मर्यादा का हवाला देते हुए दुकान में शराब पीने से मना किया, तो तथाकथित नेता का ‘अहम’ जाग उठा।

रसूख का तांडव: साथियों को बुलाकर किया हमला

मना करने से नाराज मनीष दुबे ने तुरंत फोन करके अपने साथियों को मौके पर बुला लिया। इसके बाद जो हुआ वह सीसीटीवी में साफ दिख रहा है। आरोपियों ने दुकानदार अंकित को लात-घूसों से पीटा और दुकान के काउंटर व कीमती सामान में जमकर तोड़फोड़ की। हमलावर जाते-जाते अंजाम भुगतने की धमकी भी दे गए। हैरान करने वाली बात यह है कि घटना के वक्त इलाके में पुलिस की कोई पेट्रोलिंग टीम नजर नहीं आई।

पुलिस की ‘सुस्त’ चाल और सत्ता का ‘ढाल’

पीड़ित ने तुरंत 112 नंबर पर कॉल की, लेकिन पुलिस के पहुँचने से पहले ही आरोपी आराम से फरार हो गए। कल्याणपुर थाना प्रभारी राजेंद्रकांत शुक्ला का कहना है कि तहरीर मिल गई है और जांच की जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब चेहरा सीसीटीवी में साफ है, आरोपी का नाम और पता मालूम है, तो अब तक गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? क्या पुलिस किसी ‘सफेदपोश’ के दबाव का इंतजार कर रही है?

सरकार और भाजपा संगठन से 5 तीखे सवाल:

  1. पार्टी की छवि खराब करने वाले ‘छुटभैये’ नेता: क्या भाजपा का नाम इस्तेमाल करने वाला हर शख्स कानून से ऊपर है? संगठन ऐसे गुंडागर्दी करने वाले तत्वों पर कार्रवाई क्यों नहीं करता?
  2. आधी रात को शराब और उत्पात: कानपुर में ‘पब्लिक ड्रिंकिंग’ पर रोक है, फिर भी आवास विकास जैसे रिहायशी इलाकों में अपराधी बेखौफ होकर दुकानों में शराब कैसे पी रहे हैं? क्या पुलिस का इकबाल खत्म हो गया है?
  3. व्यापारी सुरक्षा का क्या? मुख्यमंत्री कहते हैं कि व्यापारी निर्भय होकर काम करें। क्या आधी रात को अपनी दुकान बंद कर रहे व्यापारी को पीटना ही ‘व्यापारी सुरक्षा’ है?
  4. CCTV साक्ष्य या रद्दी का टुकड़ा? अक्सर ऐसे मामलों में सीसीटीवी फुटेज होने के बावजूद पुलिस ‘जांच’ के नाम पर हफ़्तों लगा देती है। क्या यह गिरफ्तारी टालने का बहाना है?
  5. कल्याणपुर पुलिस की गश्त पर सवाल: केशव वाटिका जैसे व्यस्त इलाके में रात एक बजे मारपीट और तोड़फोड़ होती है और पुलिस को भनक तक नहीं लगती। क्या नाइट ड्यूटी पर तैनात सिपाही सिर्फ ‘पिकअप पॉइंट’ पर ही मिलते हैं?

निष्कर्ष: न्याय की कसौटी पर कानपुर पुलिस

कानपुर में यह पहली बार नहीं है जब खुद को सत्ताधारी दल से जुड़ा बताकर किसी ने कानून हाथ में लिया हो। अगर मनीष दुबे जैसे लोगों पर तुरंत और सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो ‘Truth India Times’ यह मानने पर मजबूर होगा कि कानपुर में पुलिस की लाठी सिर्फ गरीबों पर चलती है, रसूखदारों के लिए तो यहाँ ‘मखमली कानून’ है।

पीड़ित अंकित अब डरा हुआ है। उसे डर है कि तहरीर देने के बाद आरोपी उस पर दोबारा हमला कर सकते हैं। अब देखना यह है कि कमिश्नरेट पुलिस इस ‘कथित नेता’ को जेल भेजती है या मामला रफा-दफा हो जाता है।

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