कानपुर में कोहरे का ‘कैरिकेचर’: शून्य विजिबिलिटी ने थामी रफ्तार, 41 ट्रेनें लेट; वंदे भारत भी 5 घंटे पीछे, क्या सिर्फ कागजों पर सुलग रहे हैं ‘सरकारी अलाव’?

कानपुर। औद्योगिक नगरी कानपुर इन दिनों सफेद अंधेरे की गिरफ्त में है। कोहरे और हाड़ कपाने वाली ओस ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। गुरुवार की सुबह जब शहर जागा, तो आसमान से लेकर जमीन तक सिर्फ कोहरा ही कोहरा था। विजिबिलिटी ‘जीरो’ होने के कारण सड़कों पर गाड़ियों की हेडलाइट्स भी जवाब दे गईं। लेकिन सबसे बुरा हाल यातायात के सबसे बड़े माध्यम ‘रेलवे’ का है। लग्जरी कही जाने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस तक कोहरे के आगे बेबस दिखी और 5 घंटे की देरी से पहुंची। सवाल यह है कि क्या प्रशासन ने इस भीषण ठंड से निपटने के लिए धरातल पर कोई ठोस काम किया है?

रफ्तार पर ‘सफेद ब्रेक’: 41 ट्रेनें बनीं कछुआ

कोहरे ने रेलवे के ‘समय पालन’ (Punctuality) के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। कानपुर सेंट्रल से गुजरने वाली 41 प्रमुख ट्रेनें घंटों की देरी से चल रही हैं। प्रीमियम ट्रेन वंदे भारत एक्सप्रेस का 5 घंटे लेट होना यह दर्शाता है कि आधुनिक तकनीक भी कोहरे के आगे फेल है।

  • यात्री प्लेटफॉर्म पर ठिठुरने को मजबूर हैं।
  • ट्रेनों की लेटलतीफी के कारण इंक्वायरी काउंटरों पर भारी भीड़ और अफरा-तफरी का माहौल है।
  • प्लेटफॉर्म पर यात्रियों के लिए हीटर या पर्याप्त वेटिंग हॉल की व्यवस्था न होना रेलवे प्रशासन की संवेदनहीनता उजागर करता है।

सड़कों पर ‘मौत’ का साया

विजिबिलिटी शून्य होने के कारण हाईवे से लेकर शहर की सड़कों तक वाहनों की रफ्तार रेंगने को मजबूर है। कोहरे के कारण पिछले 24 घंटों में कई छोटे-बड़े हादसों की खबरें आई हैं। प्रशासन ने ‘सेफ ड्राइविंग’ की एडवायजरी तो जारी कर दी, लेकिन क्या सड़कों के किनारे रिफ्लेक्टर और लाइटों की मरम्मत कराई गई?

सरकार और नगर निगम से 5 तीखे सवाल:

  1. अलाव कहाँ जल रहे हैं? कागजों पर शहर के हर चौराहे पर अलाव जलाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में गरीब और मजदूर कूड़ा जलाकर सर्दी काटने को मजबूर हैं। क्या बजट सिर्फ कागजी लकड़ियों में स्वाहा हो रहा है?
  2. रैन बसेरों की बदहाली: शहर के रैन बसेरों में क्या क्षमता के अनुसार बिस्तर और कंबल मौजूद हैं? क्या अधिकारी रात में जाकर इन रैन बसेरों की सच्चाई देख रहे हैं?
  3. स्ट्रीट लाइट और फॉग लाइट्स: कोहरे के समय शहर की कई स्ट्रीट लाइटें बंद क्यों रहती हैं? क्या नगर निगम को किसी बड़े हादसे का इंतजार है?
  4. रेलवे की विफलता: एंटी-फॉग डिवाइस के नाम पर करोड़ों खर्च करने वाला रेलवे विभाग ट्रेनों को समय पर चलाने में पूरी तरह नाकाम क्यों साबित हो रहा है? यात्रियों को प्लेटफॉर्म पर गर्म पानी और खान-पान की रियायत क्यों नहीं दी जा रही?
  5. स्वास्थ्य विभाग का अलर्ट: ठंड के कारण हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक के मामले बढ़ रहे हैं। क्या सरकारी अस्पतालों में इमरजेंसी बेड और जरूरी दवाएं पर्याप्त मात्रा में हैं?

प्रशासन के दावे बनाम हकीकत

कानपुर में कल भी भीषण कोहरे का अलर्ट जारी किया गया है। मौसम विभाग की मानें तो अभी राहत मिलने के आसार नहीं हैं। जिलाधिकारी ने स्कूलों के समय में बदलाव और अलाव की व्यवस्था के निर्देश दिए हैं, लेकिन ‘Truth India Times’ की पड़ताल में पता चला है कि कई प्रमुख चौराहों पर सुबह होने से पहले ही लकड़ियां खत्म हो जाती हैं या डाली ही नहीं जातीं।

निष्कर्ष: जनता के भरोसे छोड़ दिया गया शहर

भीषण ठंड और कोहरा एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन उससे निपटना प्रशासन का काम है। जब ट्रेनें 5-5 घंटे लेट हों और सड़कों पर विजिबिलिटी शून्य हो, तो प्रशासन को ‘हाई अलर्ट’ मोड पर रहना चाहिए। अगर समय रहते रैन बसेरों और अलाव की व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई, तो यह सर्दी गरीबों पर भारी पड़ने वाली है।

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