कानपुर हैलट में घोर लापरवाही: जिंदा मरीज को डॉक्टरों ने बताया ‘डेड’, पुलिस को दी पोस्टमॉर्टम की चिट्ठी; सांसें चलीं तो बोले- ‘सॉरी सर’

कानपुर | प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times): उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेजों में शुमार कानपुर के जीएसवीएम (GSVM) मेडिकल कॉलेज से संबद्ध हैलट अस्पताल में संवेदनहीनता और लापरवाही की सारी हदें पार हो गई हैं। यहाँ तैनात जूनियर डॉक्टरों ने एक जीवित मरीज को न केवल मृत घोषित कर दिया, बल्कि उसके शव का पोस्टमॉर्टम कराने के लिए पुलिस तक को बुला लिया। मामला तब खुला जब पुलिस बॉडी को मॉर्चुरी (शव गृह) में रखने ले गई और वहां ‘लाश’ की सांसें चलती मिलीं। इस घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था और डॉक्टरों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मौत की ‘फर्जी’ घोषणा और कागजी खानापूर्ति

जानकारी के अनुसार, एक मरीज को गंभीर स्थिति में हैलट अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया था। वहां मौजूद जूनियर डॉक्टरों ने प्रारंभिक जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि मरीज की मौत हो चुकी है। बिना किसी गहन चिकित्सीय परीक्षण या सीनियर डॉक्टर की राय लिए, जूनियर डॉक्टरों ने उसे ‘मृत’ (Brought Dead) घोषित कर दिया। हद तो तब हो गई जब डॉक्टरों ने बाकायदा कागजी कार्रवाई पूरी की और स्वरूपनगर थाने को सूचना भेज दी कि मरीज की मौत हो गई है और इसका पोस्टमॉर्टम कराया जाना आवश्यक है।

मॉर्चुरी के दरवाजे पर ‘जी’ उठा ‘मुर्दा’

सूचना मिलने पर स्वरूपनगर थाने की पुलिस अस्पताल पहुँची। पुलिसकर्मी पंचनामा भरने की तैयारी कर रहे थे और वार्ड बॉय शव को हैलट की मॉर्चुरी में शिफ्ट करने के लिए स्ट्रेचर पर ले जा रहे थे। इसी दौरान कुछ ऐसा हुआ कि वहां मौजूद लोगों के होश उड़ गए। ‘शव’ में अचानक हरकत हुई और पुलिसकर्मियों ने देखा कि मरीज की सांसें चल रही हैं।

पुलिसकर्मी यह देखकर हैरान रह गए कि जिसे डॉक्टर मृत बता रहे थे, उसका दिल धड़क रहा था। आनन-फानन में पुलिस ने डॉक्टरों को इसकी सूचना दी। जब डॉक्टरों ने दोबारा जांच की और पाया कि मरीज वाकई जिंदा है, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

“सॉरी सर, गलती हो गई…”

अपनी भारी लापरवाही पर पर्दा डालने के लिए डॉक्टरों ने पुलिस और परिजनों के सामने ‘सॉरी सर’ (Sorry Sir) कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। जूनियर डॉक्टरों ने इसे मानवीय भूल करार देते हुए कहा कि मरीज की हालत इतनी स्थिर थी कि उन्हें लगा उसकी मौत हो चुकी है। हालांकि, पुलिस प्रशासन ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है। पुलिस का कहना है कि यदि वे समय रहते ध्यान न देते और मरीज को मॉर्चुरी के फ्रीजर में रख दिया जाता, तो वह दम घुटने से मर जाता और यह सीधे तौर पर हत्या का मामला होता।

तीमारदारों का हंगामा और अस्पताल प्रशासन की चुप्पी

जैसे ही यह खबर अस्पताल परिसर में फैली, वहां मौजूद अन्य मरीजों के परिजनों ने हंगामा शुरू कर दिया। परिजनों का आरोप है कि हैलट में जूनियर डॉक्टर अक्सर लापरवाही बरतते हैं और सीनियर डॉक्टर वार्डों से नदारद रहते हैं। लोगों ने सवाल उठाया कि अगर पुलिस सक्रिय न होती, तो क्या एक जिंदा इंसान का पोस्टमॉर्टम कर दिया जाता?

इस पूरे प्रकरण पर हैलट अस्पताल प्रशासन और मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य ने अभी तक कोई कड़ा एक्शन नहीं लिया है। हालांकि, मामले के तूल पकड़ने के बाद विभागीय जांच की बात कही जा रही है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते बड़े सवाल

यह घटना केवल एक ‘सॉरी’ से खत्म होने वाली नहीं है। यह उन बुनियादी प्रोटोकॉल्स पर सवाल उठाती है जिनका पालन किसी को मृत घोषित करने से पहले किया जाना चाहिए:

  • क्या मरीज का ईसीजी (ECG) किया गया था?
  • क्या किसी सीनियर कंसल्टेंट ने मरीज को देखा था?
  • ‘डेथ सर्टिफिकेट’ या पुलिस मेमो भेजने से पहले क्या पल्स और रिफ्लेक्सिस की जांच की गई थी?

पुलिस की मुस्तैदी ने बचाई जान

इस मामले में स्वरूपनगर पुलिस की सतर्कता की सराहना की जा रही है। यदि पुलिसकर्मी डॉक्टरों की बात पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते और प्रोटोकॉल के तहत बॉडी को सीधे फ्रीजर में डलवा देते, तो एक मासूम की जान चली जाती। पुलिस ने फिलहाल इस घटना की पूरी रिपोर्ट तैयार की है ताकि उच्चाधिकारियों को सूचित किया जा सके।

निष्कर्ष: कब सुधरेगा हैलट?

कानपुर का हैलट अस्पताल अक्सर विवादों में रहता है। कभी स्ट्रेचर न मिलने पर, तो कभी डॉक्टरों के दुर्व्यवहार के कारण। लेकिन एक जीवित व्यक्ति को ‘लाश’ बनाकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज देना लापरवाही का चरम है। क्या प्रशासन इस ‘सॉरी’ को स्वीकार करेगा या दोषियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होगी जो नजीर बन सके? यह आने वाला समय बताएगा।


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