प्रभारी मंत्री की ‘पंचायत’ फेल, अब डिप्टी सीएम की चौखट पर भाजपा पार्षद; भ्रष्टाचार की फाइलों के साथ लखनऊ में होगा धमाका!

कानपुर। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र कानपुर में नगर निगम की सियासत अब ‘कोल्ड वॉर’ से निकलकर सीधे आर-पार की जंग में तब्दील हो गई है। मेयर प्रमिला पांडेय और भाजपा पार्षदों के बीच जारी घमासान को शांत कराने की प्रभारी मंत्री की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं। दो दौर की मैराथन बैठकों के बाद भी जब बात नहीं बनी, तो अब नाराज पार्षदों ने मोर्चा खोलते हुए लखनऊ कूच करने का मन बना लिया है। खबर है कि पार्षद अब भ्रष्टाचार की ‘एक्सक्लूसिव’ फाइलों के साथ डिप्टी सीएम से मुलाकात करेंगे, जिससे कानपुर नगर निगम में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल होने के संकेत मिल रहे हैं।

प्रभारी मंत्री की कोशिशों पर फिरा पानी

बीते कुछ दिनों से कानपुर नगर निगम के गलियारों में जो तनाव व्याप्त है, उसे खत्म करने के लिए प्रभारी मंत्री ने खुद कमान संभाली थी। कानपुर प्रवास के दौरान उन्होंने मेयर और पार्षदों के गुटों के साथ दो बार अलग-अलग और संयुक्त बैठकें कीं। उद्देश्य था कि आपसी मतभेद सुलझा लिए जाएं और विकास कार्यों में बाधा न आए।

हालांकि, सूत्रों की मानें तो बैठक में पार्षदों का रुख बेहद सख्त रहा। पार्षदों का आरोप है कि नगर निगम में उनकी सुनवाई नहीं हो रही है और विकास कार्यों के नाम पर बंदरबांट की जा रही है। प्रभारी मंत्री के आश्वासन के बावजूद पार्षदों ने स्पष्ट कर दिया कि अब समझौता केवल बातों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से होगा।

भ्रष्टाचार की ‘ब्लैक बुक’ लेकर लखनऊ जाएंगे पार्षद

इस विवाद में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पार्षदों के समूह ने दावा किया कि उनके पास नगर निगम में हो रहे भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत हैं। नाराज भाजपा पार्षदों का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही लखनऊ में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक से मुलाकात करेगा।

पार्षदों का कहना है कि वे अपने साथ उन फाइलों को लेकर जा रहे हैं, जिनमें टेंडरों में गड़बड़ी, घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल और अधिकारियों की मनमानी के कच्चे चिट्ठे मौजूद हैं। पार्षदों की इस रणनीति ने मेयर खेमे और नगर निगम प्रशासन की धड़कनें बढ़ा दी हैं।

क्यों भड़की है विवाद की चिंगारी?

कानपुर नगर निगम में यह विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन इस बार मामला ‘अपनों’ के बीच ही उलझ गया है। पार्षदों के मुख्य आरोप इस प्रकार हैं:

  • अनदेखी का आरोप: पार्षदों का कहना है कि वार्डों के विकास के लिए प्रस्तावित बजट और फाइलों को मेयर और अधिकारियों के स्तर पर बेवजह रोका जा रहा है।
  • अधिकारियों की दबंगई: आरोप है कि नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारी पार्षदों के प्रोटोकॉल का सम्मान नहीं कर रहे हैं।
  • भ्रष्टाचार के गंभीर मुद्दे: नाला सफाई, लाइट और सड़क निर्माण जैसे कार्यों में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए जा रहे हैं।

भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल

चूंकि मेयर और अधिकांश पार्षद भाजपा के ही हैं, इसलिए यह विवाद पार्टी की आंतरिक छवि को भी नुकसान पहुंचा रहा है। विपक्षी दल इस खींचतान को मुद्दा बनाकर सरकार पर निशाना साध रहे हैं। प्रभारी मंत्री के ‘असफल’ हस्तक्षेप के बाद अब संगठन के बड़े नेताओं को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। अगर लखनऊ में डिप्टी सीएम के सामने भ्रष्टाचार की फाइलें खुलती हैं, तो जांच की आंच कई बड़े नामों तक पहुंच सकती है।

क्या होगा अगला कदम?

कानपुर की जनता इस सियासी ड्रामे को बड़ी बेसब्री से देख रही है क्योंकि इसका सीधा असर शहर की सफाई, पानी और सड़कों जैसे बुनियादी कार्यों पर पड़ रहा है। लखनऊ में होने वाली बैठक तय करेगी कि कानपुर नगर निगम में मेयर का दबदबा बरकरार रहेगा या पार्षदों के ‘बगावती’ सुर व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव लाएंगे।

क्या प्रभारी मंत्री के विफल होने के बाद अब डिप्टी सीएम इस ‘आग’ को बुझा पाएंगे या फिर भ्रष्टाचार की फाइलें कानपुर की राजनीति में नया उबाल लेकर आएंगी? यह आने वाले कुछ दिन साफ कर देंगे।

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