कानपुर–सागर हाईवे बना 'नरक': 50 KM लंबा जाम
कानपुर | प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times): उत्तर प्रदेश के सबसे व्यस्त मार्गों में से एक कानपुर-सागर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-34) रविवार को आम जनता के लिए किसी दुःस्वप्न (Nightmare) से कम साबित नहीं हुआ। शनिवार देर रात बिधनू के शम्भुहा पुल के पास हुए एक सड़क हादसे के बाद प्रशासनिक लापरवाही का ऐसा मंजर देखने को मिला कि हाईवे करीब 50 किलोमीटर लंबे जाम की चपेट में आ गया। कड़ाके की ठंड और घने कोहरे के बीच हजारों लोग, मासूम बच्चे और जिंदगी-मौत के बीच जूझ रहे मरीज एंबुलेंस में घंटों फंसे रहे, लेकिन जिम्मेदारों ने तब सुध ली जब पानी सिर से ऊपर निकल गया।
आधी रात को ‘सिस्टम’ का एक्सीडेंट
हादसे की शुरुआत शनिवार रात करीब 11 बजे हुई। बिधनू थाना क्षेत्र के शम्भुहा पुल के पास घने कोहरे और तेज रफ्तार के कारण कई वाहन आपस में टकरा गए। सूचना मिलने पर पुलिस और NHAI की क्रेन मौके पर पहुँची। शुरुआत में क्षतिग्रस्त वाहनों को हटाकर पुलिस ने ‘खानापूर्ति’ की और यह मान लिया कि मामला सुलझ गया। लेकिन, असली समस्या तो यहीं से शुरू हुई। पुलिस बल मौके से वापस क्या लौटा, मानों अराजकता को खुला न्योता मिल गया।
रात के अंधेरे और गहराते कोहरे ने वाहनों की रफ्तार थाम दी। सड़क के बीचों-बीच फंसे कुछ वाहनों और अव्यवस्थित ट्रैफिक के कारण देखते ही देखते पहिये थमने लगे। जो जाम रात को महज कुछ सौ मीटर का था, उसने सुबह होते-होते 50 किलोमीटर के अजगर का रूप धारण कर लिया।
खड़ेसर से पतारा तक… जहाँ देखो वहां ट्रकों का रेला
रविवार की सुबह जब सूरज निकला, तो नजारा भयावह था। खड़ेसर से लेकर पतारा चौकी क्षेत्र तक, जहाँ तक नजर जा रही थी, सिर्फ और सिर्फ ट्रकों, बसों और निजी कारों की लंबी कतारें थीं। उत्तर प्रदेश को मध्य प्रदेश से जोड़ने वाला यह मुख्य मार्ग पूरी तरह ठप हो चुका था।
यात्रियों की स्थिति दयनीय थी।
- भूख-प्यास से बेहाल: जाम में फंसे छोटे बच्चों और बुजुर्गों के पास न पीने का पानी था और न ही खाने के लिए कुछ। हाईवे के किनारे स्थित ढाबे भी भारी भीड़ के कारण कम पड़ गए।
- एंबुलेंस में जंग: सबसे दर्दनाक दृश्य उन एंबुलेंसों का था जो सायरन बजा-बजाकर रास्ता मांग रही थीं, लेकिन टस से मस न होने वाले ट्रकों के बीच वे बेबस खड़ी रहीं। कइयों की जान पर बन आई, लेकिन पुलिस का कोई ‘ट्रैफिक मैनेजमेंट’ दूर-दूर तक नजर नहीं आया।
चौकी इंचार्जों की लापरवाही पर ‘तीखे’ सवाल
इस महाजाम के पीछे सबसे बड़ी वजह स्थानीय पुलिस की घोर लापरवाही बताई जा रही है। प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय निवासियों का सीधा आरोप है कि खड़ेसर और पतारा चौकी इंचार्ज अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहे।
सवाल यह है कि:
- जब हादसा रात में ही हो गया था, तो हाईवे पर गश्त (Patrolling) क्यों नहीं बढ़ाई गई?
- कोहरे की संभावना को देखते हुए पुलिस ने ट्रैफिक डायवर्जन समय रहते क्यों नहीं लागू किया?
- क्या चौकी इंचार्ज केवल दफ्तरों में बैठकर ‘सब ठीक है’ की रिपोर्ट भेज रहे थे?
राहगीरों का कहना है कि यदि रात में ही ट्रैफिक को डायवर्ट कर दिया जाता और भारी वाहनों को एक तरफ रोक दिया जाता, तो सुबह लाखों लोगों को यह प्रताड़ना नहीं झेलनी पड़ती।
पुलिस का ‘डैमेज कंट्रोल’ और एसीपी का बयान
जब जाम की खबर सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर वायरल हुई, तब जाकर आला अधिकारियों की नींद खुली। घाटमपुर एसीपी कृष्णकांत यादव भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे।
एसीपी कृष्णकांत यादव ने मीडिया को बताया, “हादसे और कोहरे के कारण यातायात प्रभावित हुआ है। हम अतिरिक्त पुलिस बल के साथ मौके पर हैं। डायवर्जन लागू किया जा रहा है और वाहनों को वैकल्पिक मार्गों से निकाला जा रहा है। जल्द ही स्थिति सामान्य हो जाएगी।”
हालांकि, जनता इस रटे-रटाए जवाब से संतुष्ट नहीं है। लोगों का पूछना है कि जब हजारों लोग पूरी रात सड़क पर ठिठुर रहे थे, तब यह ‘मुस्तैदी’ कहाँ थी?
नेशनल हाईवे की सुरक्षा और प्रबंधन पर बड़ा सवाल
यह पहली बार नहीं है जब कानपुर-सागर हाईवे पर इस तरह का जाम लगा हो। बिधनू और घाटमपुर के बीच का यह हिस्सा ‘एक्सीडेंट प्रोन जोन’ बन चुका है। इसके बावजूद:
- NHAI की सक्रियता शून्य है: हादसे के बाद सड़क साफ करने के लिए आधुनिक क्रेन और टीम हमेशा मौजूद क्यों नहीं रहती?
- ट्रैफिक पुलिस की तैनाती: इतने महत्वपूर्ण हाईवे पर रात के समय ट्रैफिक पुलिस का कोई वजूद क्यों नहीं दिखता?
आक्रोश में यात्री: “यह विकास है या विनाश?”
जाम में फंसे एक कार सवार यात्री ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, “हम 6 घंटे से एक ही जगह खड़े हैं। पुलिस सिर्फ वसूली के लिए दिखती है, जब मदद की जरूरत हो तो कोई नहीं आता। एंबुलेंस में कोई मर जाए तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?”
हाईवे पर फंसे ट्रक चालकों का भी कहना है कि पुलिस ने उन्हें कहीं भी किनारे पार्क करने का निर्देश नहीं दिया, जिससे गाड़ियां सड़क के बीचों-बीच फंसी रह गईं।
निष्कर्ष: जवाबदेही तय होनी चाहिए
कानपुर-सागर हाईवे का यह 50 किलोमीटर लंबा जाम केवल एक ‘ट्रैफिक जाम’ नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की विफलता का प्रमाण है। यह घटना चीख-चीखकर कह रही है कि हमारे पास इमरजेंसी प्लानिंग के नाम पर कुछ नहीं है। अगर पुलिस समय रहते सक्रिय होती, तो न तो एंबुलेंस फंसती और न ही हजारों जिंदगियां सड़क पर लावारिस खड़ी होतीं।
उम्मीद है कि उच्चाधिकारी केवल ‘यातायात बहाल’ करके शांत नहीं बैठेंगे, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों पर भी गाज गिरेगी जिनकी लापरवाही ने जनता को यह नर्क भोगने पर मजबूर किया।
रिपोर्ट: प्रलभ शरण चौधरी | Truth India Times
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