कानपुर | प्रलभ शरण चौधरी (Truth India Times):
सियासत की बिसात पर जब मोहरे चलते हैं, तो शोर बहुत होता है। हाल ही में मेयर ने एक पार्षद को सस्पेंड कर दिया—खबर बनी, हेडलाइन चली। लेकिन इस सस्पेंशन के पीछे छिपी उस ‘बदबूदार’ हकीकत को किसी ने नहीं देखा, जो शहर के तथाकथित ‘पॉश’ इलाके के सीने पर एक गहरे जख्म की तरह है। हम बात कर रहे हैं एक ऐसी बस्ती की, जिसकी आबादी तो 3000 है, लेकिन यहां का सच सुनकर आप अपनी नाक सिकोड़ लेंगे। यह कहानी उन घरों की है जहां आज भी ‘शौचालय’ एक लग्जरी है और इसी एक कमी ने सैकड़ों नौजवानों का भविष्य ‘कुंवारा’ बना रखा है।
“साहब! टॉयलेट नहीं है, इसलिए बहू नहीं आती”
इस वार्ड की गलियों में घुसते ही विकास के दावों की पोल खुल जाती है। यहाँ की एक बुजुर्ग महिला की सिसकियाँ व्यवस्था के मुँह पर तमाचा मारती हैं। उन्होंने बताया, “हमारे बेटे कुंवारे बैठे हैं। रिश्ते वाले आते हैं, घर देखते हैं, सब ठीक लगता है, लेकिन जैसे ही पूछते हैं कि ‘लैट्रिन-बाथरूम’ कहाँ है, और हम बाहर के सामुदायिक शौचालय की ओर इशारा करते हैं, वे उल्टे पाँव लौट जाते हैं।” यह सिर्फ एक घर की कहानी नहीं है। 3000 की आबादी वाले इस इलाके में लगभग हर दूसरा घर इसी त्रासदी से गुजर रहा है। बेटियों की शादियां तो जैसे-तैसे हो गई हैं, लेकिन दामाद यहाँ आने से कतराते हैं। “गौना” होकर गई बेटियां मायके आने के नाम से डरती हैं क्योंकि सुबह 4 बजे से ही सामुदायिक शौचालय के बाहर लंबी कतारों में लगना उनकी नियति बन जाती है।
स्मार्ट सिटी का ‘डिजीटल नर्क’
कानपुर को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने का दावा करने वाले हुक्मरानों को शायद इस बस्ती का रास्ता नहीं मालूम। यहाँ के हालात कुछ इस तरह हैं:
- सुबह की जंग: यहाँ सूरज निकलने से पहले ही युद्ध शुरू हो जाता है। सामुदायिक शौचालय के बाहर बाल्टियों की लाइन लगती है। बच्चे स्कूल जाने के लिए लेट हो जाते हैं क्योंकि टॉयलेट का नंबर आने में घंटों लग जाते हैं।
- निजता का कत्ल: घर की बहू-बेटियों के लिए स्थिति सबसे ज्यादा नारकीय है। बीमारी की हालत में या रात के अंधेरे में बाहर जाना किसी सजा से कम नहीं है।
- रिश्तेदारों का बहिष्कार: यहाँ के निवासियों का कहना है कि उनके सगे-संबंधियों ने उनके घर आना छोड़ दिया है। “नर्क में कौन रहना चाहेगा?”—यह सवाल यहाँ के हर शख्स की जुबान पर है।
पार्षद का सस्पेंशन: असली वजह या राजनीतिक स्टंट?
मेयर द्वारा पार्षद को सस्पेंड किए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल है। आरोप लगाया गया कि पार्षद ने काम नहीं किया, फंड का दुरुपयोग किया या अनुशासनहीनता की। लेकिन सवाल यह है कि क्या पार्षद को सस्पेंड करने से उन 3000 लोगों के घरों में टॉयलेट बन जाएंगे?
सच्चाई यह है कि यह इलाका दशकों से उपेक्षित है। यहाँ की जमीन, पट्टों और नक्शों के तकनीकी पेंचों में फंसाकर प्रशासन ने यहाँ के लोगों को आदिम युग में रहने पर मजबूर कर दिया है। पार्षद को सस्पेंड करना एक ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ जैसा है, जबकि इस वार्ड को ‘मेजर ऑपरेशन’ की जरूरत है।
दामाद नहीं आते, बेटे ‘रिजेक्ट’ हो रहे
समाजशास्त्रीय नजरिए से देखें तो यह स्थिति एक बड़े सामाजिक संकट को जन्म दे रही है। इस वार्ड के युवा मानसिक तनाव का शिकार हैं। एक स्थानीय युवक ने बताया, “मैं शहर की एक बड़ी कंपनी में काम करता हूँ, अच्छी सैलरी है, लेकिन जैसे ही लड़की वाले घर देखते हैं, वे रिजेक्ट कर देते हैं। वे कहते हैं कि जिस घर में बेटी को शौचालय के लिए लाइन में लगना पड़े, वहां हम रिश्ता नहीं करेंगे।” यह शर्मनाक है कि 2025 में भी एक बुनियादी जरूरत (Toilet) की कमी की वजह से शादियां टूट रही हैं। स्वच्छ भारत अभियान के करोड़ों रुपये के विज्ञापनों के बीच यह वार्ड एक ऐसा ‘ब्लैक होल’ है जहां रोशनी पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती है।
प्रशासन की फाइलें और जनता की ‘फरियाद’
जब हमने इस बारे में नगर निगम के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, तो वही पुराना जवाब मिला— “मामला संज्ञान में है, बजट पास होते ही काम शुरू होगा।” सालों से यहाँ की जनता यही ‘बजट’ और ‘संज्ञान’ वाला जुमला सुन रही है।
पार्षद के सस्पेंशन ने एक मौका दिया है कि इस वार्ड की फाइलों पर जमी धूल झाड़ी जाए।
- सीवर लाइन का अभाव: घरों में टॉयलेट न होने का सबसे बड़ा बहाना सीवर लाइन की कमी बताया जाता है।
- अतिक्रमण और संकरी गलियां: प्रशासन का तर्क है कि गलियां इतनी संकरी हैं कि वहां काम करना मुश्किल है। लेकिन सवाल यह है कि क्या तकनीक इतनी भी उन्नत नहीं हुई कि एक पोर्टेबल या आधुनिक शौचालय तकनीक का इस्तेमाल किया जा सके?
तीखे सवाल: जवाब कौन देगा?
- क्या मेयर साहिबा के पास इस वार्ड की महिलाओं की उस ‘शर्म’ का कोई जवाब है जो उन्हें रोज सार्वजनिक शौचालय की लाइन में झेलनी पड़ती है?
- क्या सस्पेंड हुए पार्षद की जगह आने वाला नया ‘प्रशासक’ रातों-रात यहाँ की सूरत बदल देगा?
- क्या ‘डिजिटल इंडिया’ का नारा उन लड़कों को शादी का सुख दे पाएगा जो सिर्फ एक टॉयलेट न होने की वजह से कुंवारे हैं?
निष्कर्ष: कागजी सस्पेंशन नहीं, समाधान चाहिए
पार्षद को सस्पेंड करना शासन की शक्ति का प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन जनता की नजर में यह तब तक बेकार है जब तक कि उस 3000 की आबादी को इंसानों जैसा जीवन न मिले। शहर के इस पॉश इलाके के बीच स्थित यह ‘नर्क’ हमारे सिस्टम की विफलता का सबसे बड़ा स्मारक है।
अखबार की सुर्खियां पार्षद के सस्पेंशन पर नाचती रहेंगी, लेकिन Truth India Times उस दिन खबर छापेगा जिस दिन यहाँ के किसी बेटे की बारात इसलिए नहीं रुकेगी क्योंकि उसके घर में शौचालय नहीं है।
रिपोर्ट: प्रलभ शरण चौधरी | Truth India Times
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