बांदा जेल से गैंगस्टर रवि काना की ‘अवैध’ रिहाई पर हड़कंप: जेलर सस्पेंड, कोर्ट ने जेल अधीक्षक से पूछा- आप पर FIR क्यों न हो?

नोएडा/बांदा: उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कुख्यात स्क्रैप माफिया और गैंगस्टर रविंद्र उर्फ रवि नागर उर्फ रवि काना को बांदा जेल से बिना किसी ठोस अदालती आदेश के रिहा कर दिया गया। यह लापरवाही तब हुई जब नोएडा की एक अदालत में उसके खिलाफ रिमांड की प्रक्रिया चल रही थी। इस बड़ी प्रशासनिक चूक के सामने आते ही शासन ने तत्काल प्रभाव से बांदा जेल के जेलर विक्रम सिंह यादव को सस्पेंड कर दिया है, जबकि गौतमबुद्ध नगर की सीजेएम कोर्ट ने जेल अधीक्षक को कड़ी फटकार लगाते हुए गिरफ्तारी और एफआईआर की चेतावनी दी है।

क्या है पूरा मामला?

मामला साल 2026 में दर्ज एक नए मुकदमे से जुड़ा है। नोएडा सेक्टर-63 थाने में रवि काना के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। चूंकि रवि काना पहले से ही अगस्त 2024 से अन्य मामलों में बांदा जेल में बंद था, इसलिए नोएडा पुलिस ने उसकी कस्टडी प्राप्त करने के लिए कोर्ट से ‘बी-वारंट’ (प्रोडक्शन वारंट) हासिल किया था। 28 जनवरी को जारी इस वारंट का उद्देश्य आरोपी को अदालत के समक्ष पेश करना था।

29 जनवरी को पुलिस सुरक्षा न मिल पाने के कारण रवि काना की पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए कराई गई। कोर्ट में उसकी रिमांड पर सुनवाई चल रही थी। नियमतः, जब कोई आरोपी बी-वारंट पर होता है, तो उसे तब तक रिहा नहीं किया जा सकता जब तक अदालत स्पष्ट आदेश न दे। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उसी शाम 6:39 बजे जेल प्रशासन ने उसे जेल से बाहर कर दिया।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “क्यों न आप पर दर्ज हो मुकदमा?”

गौतमबुद्ध नगर के सीजेएम संजीव कुमार त्रिपाठी की अदालत ने इस घटनाक्रम पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने जेल अधीक्षक अनिल कुमार गौतम को नोटिस जारी कर दो टूक शब्दों में पूछा है कि जब आरोपी बी-वारंट पर तलब था और रिमांड की कार्यवाही जारी थी, तो उसे किस आधार पर छोड़ा गया?

कोर्ट ने जेल प्रशासन से दो मुख्य बिंदुओं पर जवाब मांगा है:

  1. रिहाई के आधार: किन परिस्थितियों में एक बी-वारंट प्राप्त आरोपी को बिना कोर्ट के अंतिम फैसले के रिहा किया गया?
  2. कस्टडी से भागने का मामला: जब रिमांड की सुनवाई चल रही थी, तब आरोपी को छोड़ना क्या उसे कस्टडी से भगाने की साजिश नहीं है? इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर एफआईआर क्यों न दर्ज की जाए?

जेल प्रशासन की दलील: “आदेश मिलने में हुई देरी”

विवाद बढ़ता देख बांदा जेल अधीक्षक अनिल कुमार गौतम ने अपनी सफाई पेश की है। उनका कहना है कि रवि काना के खिलाफ दर्ज 20 से अधिक मामलों में उसे पहले ही रिहाई के आदेश मिल चुके थे। अंतिम मामले में रिहाई का परवाना 28 जनवरी की सुबह ही मिल गया था।

अधीक्षक के अनुसार, “हमने शाम 5 बजे तक कोर्ट के किसी कस्टडी वारंट या ईमेल का इंतजार किया। जब कोई निर्देश नहीं मिला, तो रूटीन प्रक्रिया के तहत उसे रिहा कर दिया गया।” जेल प्रशासन का दावा है कि नोएडा कोर्ट का कस्टडी वारंट रात करीब 7:45 बजे मेल पर आया, लेकिन तब तक रवि काना जेल की दहलीज पार कर चुका था। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया है क्योंकि बी-वारंट की जानकारी जेल प्रशासन को पहले से थी।

कौन है रवि काना?

रविंद्र उर्फ रवि काना पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बड़ा स्क्रैप माफिया है। उस पर गैंगरेप, रंगदारी, और गैंगस्टर एक्ट समेत दो दर्जन से अधिक संगीन मामले दर्ज हैं। वह लंबे समय तक फरार रहा था और उसे थाईलैंड से डिपोर्ट कर भारत लाया गया था। उसकी रिहाई की खबर ने नोएडा पुलिस और एसटीएफ (STF) की रातों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि एक खूंखार अपराधी का इस तरह जेल से बाहर जाना सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है।

प्रशासनिक कार्रवाई और अगला कदम

फिलहाल, शासन ने जेलर विक्रम सिंह यादव को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए सस्पेंड कर दिया है। जेल अधीक्षक को 6 फरवरी तक कोर्ट में अपनी विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करनी है। नोएडा पुलिस रवि काना की दोबारा गिरफ्तारी के लिए छापेमारी कर रही है। सूत्र बताते हैं कि इस मामले में जेल के कुछ अन्य बड़े अधिकारियों पर भी गाज गिर सकती है, क्योंकि यह केवल एक ‘टाइपिंग मिस्टेक’ या ‘देरी’ का मामला नहीं, बल्कि एक पेशेवर अपराधी को कानूनी प्रक्रिया के बीच से निकालने की गंभीर साजिश की ओर इशारा कर रहा है।

निष्कर्ष: यह घटना उत्तर प्रदेश की जेलों में ‘मैनुअल’ और ‘डिजिटल’ तालमेल की कमी को उजागर करती है। अगर शाम 6 बजे रिहाई हुई और रात 8 बजे आदेश पहुंचा, तो क्या जेल प्रशासन को रिमांड की सुनवाई खत्म होने का इंतजार नहीं करना चाहिए था? यह सवाल अब पूरे महकमे के गले की फांस बन गया है।

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