वंदे भारत की रफ़्तार पर ‘लावारिस’ ब्रेक: सीतापुर में मवेशी से टकराई सेमी-हाईस्पीड ट्रेन, सरकार की फेंसिंग और सुरक्षा के दावों की खुली पोल

सीतापुर/अटरिया: भारत की आधुनिक रेल यात्रा का प्रतीक कही जाने वाली ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ एक बार फिर व्यवस्थाओं की खामियों का शिकार हुई है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद अंतर्गत अटरिया थाना क्षेत्र में शुक्रवार शाम एक मवेशी के ट्रैक पर आ जाने से गोमतीनगर-सहारनपुर वंदे भारत एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 26504) दुर्घटनाग्रस्त हो गई। यह हादसा केवल एक मवेशी की जान जाने और ट्रेन के क्षतिग्रस्त होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह करोड़ों की लागत से बनी इस सेमी-हाईस्पीड ट्रेन की सुरक्षा और रेलवे ट्रैक की घेराबंदी (Fencing) पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

हादसे का घटनाक्रम: शाम 5 बजे थम गई रफ़्तार

शुक्रवार शाम करीब 5 बजे, जब वंदे भारत एक्सप्रेस अपनी पूरी गरिमा के साथ सहारनपुर की ओर बढ़ रही थी, तभी अटरिया क्षेत्र के नीलगांव रेलवे क्रॉसिंग संख्या 39-सी के पास अचानक एक मवेशी ट्रैक पर आ गया। ट्रेन की गति अधिक होने के कारण लोको पायलट के पास इमरजेंसी ब्रेक लगाने का भी पर्याप्त समय नहीं था। टक्कर इतनी भीषण थी कि मवेशी के चिथड़े उड़ गए और ट्रेन का ‘नोज कोन’ (अगला हिस्सा) बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।

हादसे के तुरंत बाद सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत ट्रेन को अटरिया रेलवे स्टेशन पर आपातकालीन स्थिति में रोका गया। करीब 20 मिनट तक ट्रेन स्टेशन पर खड़ी रही, जिससे यात्रियों में हड़कंप मच गया। अटरिया स्टेशन मास्टर संजय सिंह के नेतृत्व में तकनीकी टीम ने क्षतिग्रस्त हिस्से का मुआयना किया और अस्थायी मरम्मत के बाद ट्रेन को आगे के लिए रवाना किया गया।


सवाल व्यवस्था पर: कहाँ गई सरकार की फेंसिंग योजना?

वंदे भारत जैसी अत्याधुनिक ट्रेनों को चलाने के लिए सरकार ने रेलवे ट्रैक के दोनों ओर कंक्रीट की दीवारें या लोहे की फेंसिंग लगाने का वादा किया था। विशेषकर उत्तर प्रदेश के उन इलाकों में जहां लावारिस मवेशियों की समस्या विकराल है। सीतापुर का यह हादसा गवाही दे रहा है कि धरातल पर ये दावे कागजी साबित हो रहे हैं।

1. करोड़ों की संपत्ति का नुकसान: वंदे भारत का अगला हिस्सा ‘एयरोडायनेमिक’ डिजाइन का होता है, जिसे विशेष फाइबर और कंपोजिट सामग्री से बनाया जाता है। एक छोटी सी टक्कर भी रेलवे को लाखों रुपये का फटका लगाती है। क्या जनता के टैक्स के पैसे का इस तरह बार-बार नुकसान होना स्वीकार्य है?

2. यात्रियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़: हालांकि इस हादसे में किसी यात्री को चोट नहीं आई, लेकिन यदि मवेशी ट्रेन के पहियों के नीचे फंस जाता, तो ट्रेन के पटरी से उतरने (Derailment) की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था। 130-160 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ती ट्रेन के लिए एक छोटा सा मवेशी भी ‘मौत का फंदा’ बन सकता है।


लावारिस मवेशी: एक बड़ी प्रशासनिक विफलता

सीतापुर और आसपास के जिलों में छुट्टा जानवरों की समस्या किसी से छिपी नहीं है। योगी सरकार द्वारा गौशालाओं के निर्माण और मवेशियों को संरक्षित करने के सख्त निर्देशों के बावजूद, ये जानवर रेलवे ट्रैक और एक्सप्रेसवे पर कैसे पहुंच रहे हैं?

  • ब्लैक स्पॉट की पहचान में देरी: नीलगांव रेलवे क्रॉसिंग के पास अक्सर मवेशियों का जमावड़ा रहता है। रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और स्थानीय प्रशासन ने इस ‘ब्लैक स्पॉट’ को सुरक्षित करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए?
  • ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी: ग्रामीण इलाकों में प्रधानों और स्थानीय प्रशासन को सख्त हिदायत दी गई थी कि कोई भी मवेशी ट्रैक के पास न आए। अटरिया की इस घटना ने साफ कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर निगरानी शून्य है।

रेलवे की ‘जुगाड़’ तकनीक और यात्रियों का डर

अटरिया स्टेशन पर क्षतिग्रस्त हिस्से को ‘अस्थायी रूप से बांधकर’ रवाना करना रेलवे की मजबूरी हो सकती है, लेकिन यह यात्रियों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा करता है। ट्रेन में सवार यात्रियों का कहना था कि अचानक आए झटके और 20 मिनट तक स्टेशन पर रुकने से वे सहम गए थे। क्या भारत की ‘प्रीमियम’ ट्रेन को रस्सी या तारों से बांधकर चलाना ही हमारी तकनीकी प्रगति है?


सरकार को लेने होंगे ये कड़े एक्शन (डिमांड नोट)

ट्रुथ इंडिया टाइम्स के माध्यम से हम रेल मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार से निम्नलिखित बिंदुओं पर तत्काल कार्रवाई की मांग करते हैं:

  1. कंपलसरी फेंसिंग: उत्तर प्रदेश के उन सभी संवेदनशील रूटों पर, जहां वंदे भारत या अन्य हाई-स्पीड ट्रेनें चलती हैं, 100% फेंसिंग का कार्य युद्ध स्तर पर पूरा किया जाए।
  2. ड्रोन और सेंसर आधारित निगरानी: घने रिहायशी और ग्रामीण इलाकों वाले ट्रैकों पर ड्रोन सर्विलांस या ‘Cattle Detection System’ का उपयोग किया जाए, जो लोको पायलट को पहले ही सूचित कर सके।
  3. जवाबदेही तय हो: जिस क्षेत्र में मवेशी ट्रैक पर आया, वहां के संबंधित अधिकारी, RPF बीट प्रभारी और ग्राम प्रशासन पर सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो।
  4. पशुपालकों पर जुर्माना: यदि मवेशी पालतू पाया जाता है, तो उसके मालिक पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

निष्कर्ष: केवल आधुनिकता काफी नहीं, सुरक्षा भी अनिवार्य

ट्रेन को केसरिया या नीला रंग देने और उसमें वाई-फाई लगाने से भारतीय रेल ‘विश्व स्तरीय’ नहीं बनेगी। विश्व स्तरीय रेल का असली मानक ‘सुरक्षा’ है। सीतापुर की घटना एक चेतावनी है। यदि समय रहते ट्रैक को सुरक्षित नहीं किया गया और छुट्टा जानवरों की समस्या का समाधान नहीं निकाला गया, तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा देश की साख पर बट्टा लगा सकता है।

प्रशासन को समझना होगा कि वंदे भारत देश की शान है, और इसकी सुरक्षा में चूक सीधे तौर पर व्यवस्था की विफलता है।

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