उन्नाव का 'अटल' चमत्कार
Unnao/Truth India Times Digital Desk
उन्नाव। जहाँ एक ओर उत्तर प्रदेश के तमाम नगर निकाय कूड़े के निस्तारण और कचरे के प्रबंधन को लेकर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी नाकाम साबित हो रहे हैं, वहीं उन्नाव नगर पालिका ने एक ऐसी मिसाल पेश की है जिसकी गूंज अब पूरे प्रदेश में सुनाई दे रही है। शहर के पीडी नगर में नगर पालिका ने ‘वेस्ट से वंडर’ (कबाड़ से कमाल) की थीम पर ‘अटल उपवन’ विकसित किया है।
यह पार्क केवल एक मनोरंजन स्थल नहीं है, बल्कि उन नगर पालिकाओं और अफसरों के लिए एक करारा जवाब है जो बजट की कमी का रोना रोते हैं। उन्नाव नगर पालिका ने साबित कर दिया है कि अगर ‘विज़न’ हो, तो कबाड़ भी सोना बन सकता है।
कबाड़खाना बना ‘बच्चों का स्वर्ग’: पाइप से झूले और ड्रम से कलाकारी
नगर पालिका परिसर और डंपिंग ग्राउंड में वर्षों से पड़े जंग लगे लोहे के पाइप, अनुपयोगी ढांचे और पुराने ड्रम अब ‘अटल उपवन’ की शान बढ़ा रहे हैं।
- रचनात्मक रिसाइक्लिंग: कबाड़ के रूप में फेंके गए सामानों को वेल्डिंग और पेंटिंग के जरिए बच्चों के लिए रंग-बिरंगे झूलों में तब्दील कर दिया गया है।
- फ्री ओपन जिम: युवाओं और बुजुर्गों के लिए पार्क में ओपन जिम की व्यवस्था की गई है, जहाँ पुराने लोहे के ढांचों को एक्सरसाइज मशीनों का रूप दिया गया है।
- स्वच्छता संग्रहालय: पार्क के अंदर एक छोटा संग्रहालय भी बनाया गया है जो लोगों को सूखा और गीला कचरा अलग करने और रिसाइक्लिंग की अहमियत समझाता है।
प्रशासन और सरकार के लिए सबक: “कचरा नहीं, सोच बेकार होती है”
नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि भानु मिश्रा ने इस प्रोजेक्ट के पीछे की मंशा साफ करते हुए कहा, “हमने सीमित संसाधनों में यह पार्क बनाया है ताकि लोग समझें कि कचरा बेकार नहीं होता, उसे देखने वाली सोच बेकार होती है। हमारा उद्देश्य स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना है।” यह पहल सीधे तौर पर उन सरकारी विभागों को आईना दिखाती है जो बड़े प्रोजेक्ट्स के नाम पर भारी-भरकम बजट ठिकाने लगाते हैं, लेकिन परिणाम शून्य रहता है। ‘अटल उपवन’ यह सवाल पूछता है कि यदि उन्नाव कबाड़ से वंडर पार्क बना सकता है, तो लखनऊ, कानपुर और प्रयागराज जैसे बड़े शहरों के डंपिंग ग्राउंड आज भी पहाड़ क्यों बने हुए हैं?
पर्यटक भी हुए मुरीद: उन्नाव मॉडल की गूँज बाहर तक
अटल उपवन केवल स्थानीय लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए भी कौतूहल का विषय बन गया है। राजस्थान से आए पर्यटक सुरेश ने अपनी हैरानी व्यक्त करते हुए कहा, “हमने देश के कई शहर घूमे, लेकिन वेस्ट मटेरियल का इतना सुंदर उपयोग पहली बार देखा। यह सोच दूसरे शहरों के लिए भी एक रोल मॉडल होनी चाहिए।” स्थानीय निवासियों का कहना है कि पहले यहाँ गंदगी रहती थी, लेकिन अब यह जगह शहर का सबसे सुंदर कोना बन गई है।
निष्कर्ष: सरकारी तंत्र के लिए ‘अटल उपवन’ एक चुनौती
उन्नाव नगर पालिका की यह पहल ‘स्मार्ट सिटी’ की अवधारणा को सही मायने में धरातल पर उतारती है। ‘अटल उपवन’ ने यह साबित किया है कि स्वच्छता केवल झाड़ू लगाने से नहीं, बल्कि रचनात्मकता से आती है। अब उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह इस ‘उन्नाव मॉडल’ को प्रदेश के अन्य जनपदों में भी लागू करे ताकि कचरा प्रबंधन की समस्या का समाधान ‘वेस्ट टू वंडर’ के जरिए निकाला जा सके।
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