गंगा की लहरों का तांडव: शुक्लागंज में शिव पांडा घाट तक पहुँचा कटान का खतरा, दहशत में ग्रामीण, सुरक्षा परियोजना की तैयारी शुरू

उन्नाव। जनपद उन्नाव के शुक्लागंज क्षेत्र में गंगा नदी का रौद्र रूप थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले एक माह से जारी भीषण कटान ने अब विकराल रूप धारण कर लिया है, जिससे नदी किनारे बसे हजारों लोगों की रातों की नींद उड़ गई है। नदी की तेज धारा अब प्रसिद्ध शिव पांडा घाट की सीढ़ियों और आसपास की घनी आबादी के बिल्कुल करीब पहुंच गई है। कटान की इस गंभीरता को देखते हुए अब प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ है और एक बड़ी सुरक्षा परियोजना को मंजूरी मिलने की उम्मीद जगी है।

शिव पांडा घाट पर मंडराया अस्तित्व का संकट

शुक्लागंज का शिव पांडा घाट आस्था और स्थानीय संस्कृति का केंद्र है, लेकिन वर्तमान में गंगा की लहरें इसे अपने आगोश में लेने को आतुर दिख रही हैं। पिछले 30 दिनों के भीतर गंगा ने तटवर्ती इलाकों की कई बीघा जमीन को निगल लिया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि कटान की गति इतनी तेज है कि हर दिन जमीन का एक बड़ा हिस्सा नदी में समा रहा है। यदि जल्द ही ठोस उपाय नहीं किए गए, तो शिव पांडा घाट का अस्तित्व समाप्त हो सकता है और आसपास के पक्के मकानों में दरारें आ सकती हैं।

दहशत के साये में जीने को मजबूर ग्रामीण

‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ की टीम ने जब प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया, तो वहां सन्नाटा और डर का माहौल मिला। ग्रामीणों ने बताया कि रात के समय जब लहरें मिट्टी के बड़े-बड़े टीलों को काटती हैं, तो गिरने वाली आवाज से पूरा इलाका दहल जाता है। कई परिवारों ने एहतियात के तौर पर अपने घरों का कीमती सामान सुरक्षित स्थानों पर भेजना शुरू कर दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि कटान हर साल की समस्या है, लेकिन प्रशासन केवल खानापूर्ति के नाम पर ‘बंबू क्रेट’ और बालू की बोरियां डालकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है।

प्रशासनिक टीम का निरीक्षण और सुरक्षा परियोजना

मामले की गंभीरता को देखते हुए सिंचाई विभाग और राजस्व टीम ने प्रभावित क्षेत्रों का विस्तृत निरीक्षण किया है। अधिकारियों ने शिव पांडा घाट से लेकर अन्य संवेदनशील बिंदुओं तक कटान की गहराई और धारा की गति को मापा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, गंगा कटान को स्थायी रूप से रोकने के लिए एक विस्तृत सुरक्षा परियोजना (Anti-Erosion Project) का खाका तैयार किया गया है। इस परियोजना के तहत नदी के किनारों पर पत्थर की पिचिंग और ‘स्टड’ (Studs) बनाने का प्रस्ताव है, जिससे पानी की धारा को आबादी से दूर मोड़ा जा सके।

करोड़ों का बजट और शासन को प्रस्ताव

निरीक्षण दल में शामिल इंजीनियरों ने बताया कि इस स्थायी सुरक्षा कार्य के लिए करोड़ों रुपये के बजट की आवश्यकता है। इसका औपचारिक प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी आश्वासन दिया है कि वे मुख्यमंत्री और सिंचाई मंत्री से मिलकर इस परियोजना को जल्द से जल्द मंजूरी दिलाएंगे ताकि बरसात का मौसम आने से पहले काम शुरू हो सके।

क्या बालू की बोरियां रोक पाएंगी गंगा का वेग?

फिलहाल तात्कालिक राहत के तौर पर प्रशासन ने कुछ स्थानों पर बालू की बोरियां लगवाना शुरू किया है, लेकिन ग्रामीण इससे संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि गंगा की तेज धारा के सामने ये बोरियां तिनके की तरह बह जाती हैं। क्षेत्रवासियों की मांग है कि जब तक पक्का काम शुरू नहीं होता, तब तक आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर तटबंध को मजबूत किया जाए।

निष्कर्ष: समय रहते चेतने की जरूरत

शुक्लागंज में गंगा का कटान केवल एक भौगोलिक आपदा नहीं है, बल्कि यह हजारों जिंदगियों और उनकी मेहनत की कमाई (मकानों) के डूबने का संकट है। शिव पांडा घाट तक खतरे का पहुंचना प्रशासन के लिए एक अंतिम चेतावनी है। ‘ट्रुथ इंडिया टाइम्स’ इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाता रहेगा ताकि शासन की नींद टूटे और इस सुरक्षा परियोजना को कागजों से निकालकर धरातल पर उतारा जा सके।

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