नववर्ष की रात SP ने पेश की इंसानियत की मिसाल; घायलों को अपनी गाड़ी से पहुँचाया अस्पताल, पर ‘किलर हाईवे’ और ‘सफेद मौत’ का जिम्मेदार कौन?

उन्नाव। नववर्ष की शुरुआत जहाँ पूरी दुनिया जश्न के साथ कर रही थी, वहीं उन्नाव की सड़कों पर ‘सफेद मौत’ यानी घना कोहरा तांडव मचा रहा था। इस बीच गंगाघाट क्षेत्र में एक ऐसा हादसा हुआ जो जानलेवा साबित हो सकता था, लेकिन पुलिस अधीक्षक (SP) जय प्रकाश सिंह की तत्परता ने तीन जिंदगियों को मौत के मुंह से खींच लिया। एसपी ने न केवल प्रोटोकॉल तोड़ा बल्कि अपनी स्कॉट गाड़ी को एम्बुलेंस बनाकर घायलों को अस्पताल पहुँचाया।

मगर, इस सराहनीय कार्य के पीछे एक कड़वा सच यह भी है कि आखिर हर साल कोहरे के दौरान होने वाले इन हादसों के लिए शासन और लोक निर्माण विभाग (PWD) की जवाबदेही कब तय होगी?

खंती में गिरे थे तीन युवक, देवदूत बनकर पहुँचे SP

घटना नववर्ष की रात गंगाघाट थाना क्षेत्र के मरहला आजाद मार्ग की है। कड़ाके की ठंड और दृश्यता (Visibility) शून्य होने के कारण एक मोटरसाइकिल अनियंत्रित होकर गहरी खंती में जा गिरी। बाइक सवार तीनों युवक गंभीर रूप से घायल होकर तड़प रहे थे और कोहरे के कारण किसी को उनकी चीखें सुनाई नहीं दे रही थीं।

संयोगवश, कानून व्यवस्था का जायजा लेने निकले एसपी जय प्रकाश सिंह उसी मार्ग से गुजर रहे थे। जैसे ही उन्हें हादसे की भनक लगी, उन्होंने तत्काल अपना काफिला रुकवाया। घने अंधेरे और कोहरे के बीच एसपी स्वयं खंती की ओर बढ़े और पुलिसकर्मियों की मदद से तीनों घायलों को बाहर निकलवाया।

जब एम्बुलेंस का इंतजार बना जानलेवा खतरा

हादसे के वक्त घायलों की हालत इतनी नाजुक थी कि एम्बुलेंस का इंतजार करना उनकी जान पर भारी पड़ सकता था। ऐसे में एसपी जय प्रकाश सिंह ने किसी सरकारी प्रक्रिया का इंतजार नहीं किया और अपनी स्कॉट गाड़ी को खाली कराकर घायलों को उसमें लिटाया। उन्होंने पुलिसकर्मियों को निर्देश दिया कि बिना एक सेकंड गंवाए इन्हें जिला अस्पताल पहुँचाया जाए।

अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि अगर 10 मिनट की भी देरी होती, तो अधिक रक्तस्राव के कारण परिणाम घातक हो सकते थे। फिलहाल तीनों घायलों की स्थिति स्थिर है और वे सुरक्षित हैं।

व्यवस्था पर सवाल: क्या केवल पुलिस के भरोसे रहेगी सड़क सुरक्षा?

जहाँ एक ओर एसपी की प्रशंसा हो रही है, वहीं ‘Truth India Times’ प्रशासन से कुछ तीखे सवाल पूछता है:

  1. सफेद मौत (कोहरा) और PWD की सुस्ती: मरहला आजाद मार्ग जैसे संवेदनशील रास्तों पर क्या लोक निर्माण विभाग ने रिफ्लेक्टर, सफेद पट्टी या इंडिकेटर बोर्ड लगाए हैं? कोहरे में जब दृश्यता कम होती है, तब ये रिफ्लेक्टर ही चालक का मार्गदर्शन करते हैं। इनकी अनुपस्थिति सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही है।
  2. खंती और असुरक्षित किनारे: सड़क किनारे बनी गहरी खंती के पास सुरक्षा दीवार या रेलिंग क्यों नहीं है? अगर वहां सुरक्षा घेरा होता, तो शायद बाइक सवार खंती में गिरने से बच जाते।
  3. स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव: क्या गंगाघाट जैसे इलाकों में ‘रिस्पॉन्स टाइम’ के भीतर एम्बुलेंस पहुँचने की कोई ठोस व्यवस्था है? क्यों एक जिले के कप्तान को अपनी गाड़ी एम्बुलेंस की तरह इस्तेमाल करनी पड़ती है? यह जिले की आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता को दर्शाता है।

जवाबदेही किसकी?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में शीत लहर और कोहरे के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में 30% का इजाफा हो जाता है। इसके बावजूद, सड़क सुरक्षा समिति की बैठकें केवल कागजों तक सीमित रहती हैं। परिवहन विभाग और PWD के अधिकारियों की यह जवाबदेही है कि वे ‘ब्लैक स्पॉट्स’ को चिन्हित कर वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करें।

निष्कर्ष: प्रशंसा के साथ आत्ममंथन की जरूरत

एसपी जय प्रकाश सिंह का यह कदम निश्चित रूप से पुलिस के ‘मित्र पुलिस’ वाले चेहरे को उजागर करता है और जनता के बीच पुलिस की छवि को मजबूत करता है। लेकिन सरकार को यह समझना होगा कि हर घायल के पास से जिले का एसपी नहीं गुजरेगा।

सड़क सुरक्षा के लिए केवल पुलिस की गश्त काफी नहीं है; इसके लिए सड़कों का बुनियादी ढांचा सुरक्षित होना चाहिए। जब तक जिम्मेदार विभाग अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागेंगे, तब तक मासूम लोग इसी तरह ‘अदृश्य’ मोड़ों और ‘अंधेरी’ खंतियों का शिकार होते रहेंगे।

जनता अब पूछ रही है—क्या अगली बार भी किसी की जान बचाने के लिए संयोग का ही इंतजार करना होगा, या प्रशासन अपनी ओर से सुरक्षा की गारंटी देगा?


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