उन्नाव में UGC के नए नियमों पर आर-पार: सवर्ण समाज ने फूंका बिगुल, ‘नो अपील-नो वकील’ प्रावधान को बताया काला कानून

उन्नाव। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद का हसनगंज कस्बा गुरुवार को राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मी का केंद्र बन गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के कथित नए नियमों को लेकर सवर्ण समाज का गुस्सा फूट पड़ा है। हजारों की संख्या में जुटे लोगों ने इन प्रावधानों को “प्राकृतिक न्याय” के विरुद्ध बताते हुए इसे सवर्ण समाज के खिलाफ एक बड़ी साजिश करार दिया। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि बिना जांच और बिना कानूनी बचाव के सजा का प्रावधान किसी भी लोकतांत्रिक देश में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

‘नो अपील, नो वकील’ प्रावधान पर भड़का आक्रोश

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. भानू सिंह और जिलाध्यक्ष ब्रजेन्द्र सिंह ने सभा को संबोधित करते हुए यूजीसी के नियमों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि नए नियमों के तहत यदि सवर्ण समाज के किसी व्यक्ति पर कोई आरोप लगता है, तो उसे अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका दिए बिना सीधे सजा और जुर्माने का भागी बनाया जा रहा है।

वक्ताओं ने इसे “काला कानून” की संज्ञा देते हुए कहा कि “नो अपील, नो वकील, सीधे सजा” का यह फॉर्मूला न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अब देश में आरोपों की सत्यता जांचने की परंपरा खत्म कर दी जाएगी?

अपने ही जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल

हसनगंज की सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों के निशाने पर सिर्फ नियम बनाने वाले ही नहीं, बल्कि सवर्ण समाज के जनप्रतिनिधि भी रहे। प्रदर्शन के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठा कि संसद और विधानसभाओं में सवर्ण समाज के लगभग 130 प्रतिनिधि मौजूद हैं, फिर भी ऐसे “एकतरफा” नियमों पर वे खामोश क्यों हैं?

हालांकि, कुछ वक्ताओं ने नरम रुख अपनाते हुए कहा कि संभव है कि ये सांसद या विधायक संबंधित समितियों का हिस्सा न रहे हों और अनजाने में यह चूक हुई हो। लेकिन उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अब समय आ गया है जब इन जनप्रतिनिधियों को समाज के हितों के लिए मुखर होना होगा, अन्यथा भविष्य में उन्हें जनता के कड़े विरोध का सामना करना पड़ेगा।

मंत्री के “अराजक तत्व” वाले बयान पर पलटवार

हाल ही में बिछिया क्षेत्र के जालपा देवी मंदिर में मैनपुरी के मंत्री प्रेम सिंह शाक्य ने इस विरोध को “अराजक तत्वों द्वारा फैलाई गई भ्रांति” बताया था। प्रदर्शनकारियों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। वक्ताओं ने कहा कि हर किसी को अपनी बात रखने का हक है, लेकिन हज़ारों लोगों की इस भीड़ को ‘अराजक’ कहना गलत है। यह विरोध किसी के बहकावे में नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और न्याय की रक्षा के लिए है।

“झूठे आरोपों पर भी बने कड़ा कानून”

प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि वे कानून-व्यवस्था के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे “न्याय की समानता” की मांग कर रहे हैं। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

  • किसी भी आरोप की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो।
  • आरोपी को वकील करने और उच्च न्यायालय में अपील करने का पूरा अधिकार मिले।
  • सबसे महत्वपूर्ण: यदि कोई व्यक्ति किसी निर्दोष पर झूठा आरोप लगाता है, तो उस शिकायतकर्ता के खिलाफ भी उतना ही कड़ा दंडात्मक प्रावधान होना चाहिए जितनी सजा मूल अपराध के लिए तय है।

सर्वसमाज के समर्थन का दावा

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने यह भी दावा किया कि यह लड़ाई केवल सवर्णों की नहीं है। आंदोलनकारियों के मुताबिक, पिछड़े वर्ग और अन्य समाजों के जागरूक लोग भी उनके साथ हैं, क्योंकि “अन्यायपूर्ण कानून” भविष्य में किसी भी वर्ग को अपना निशाना बना सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे नियमों से समाज में जातिगत विद्वेष बढ़ेगा, जो देश की एकता के लिए घातक साबित होगा।

निष्कर्ष: घंटों चले इस प्रदर्शन के बाद प्रदर्शनकारियों ने ‘भारत माता की जय’ के नारों के साथ अपना ज्ञापन प्रशासन को सौंपा। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन उमड़े जनसैलाब ने सरकार को यह संकेत दे दिया है कि यदि नियमों पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो यह चिंगारी बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है।

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