उन्नाव विकास भवन में भारी अव्यवस्था: SIR नोटिस पर उमड़ा जनसैलाब, 4 घंटे देरी से पहुंचे साहब, कतारों में बिलखते रहे बुजुर्ग और महिलाएं

उन्नाव। शासन की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की संवेदनहीनता का एक बड़ा नमूना गुरुवार को उन्नाव के विकास भवन में देखने को मिला। SIR (SIR) नोटिस के जवाब में अपने दस्तावेजों का सत्यापन कराने पहुंचे सैकड़ों ग्रामीणों को अधिकारियों की लेट-लतीफी के कारण नारकीय स्थिति का सामना करना पड़ा। अधिकारी अपने वातानुकूलित कमरों से घंटों गायब रहे, जबकि बाहर जनता चिलचिलाती धूप और उमस के बीच धक्के खाने को मजबूर थी।

सुबह 9 बजे से ही कतारों में लग गए थे लोग

जैसे ही विकास भवन के दरवाजे खुले, जिले के विभिन्न कोनों से आए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। लोग अपने पैन कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड और अन्य जरूरी कागजात लेकर इस डर में पहुंचे थे कि कहीं देरी होने पर उनका काम रुक न जाए। सुबह 9 बजे से ही विकास भवन परिसर में लंबी-लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं। देखते ही देखते भीड़ इतनी बढ़ गई कि परिसर छोटा पड़ गया और लोग मुख्य गेट तक लाइनों में खड़े नजर आए।

साहब आए तो 4 घंटे बाद: अव्यवस्था का बोलबाला

हैरानी की बात यह रही कि जहां जनता सुबह से अपनी बारी का इंतजार कर रही थी, वहीं संबंधित पटल के अधिकारी और कर्मचारी अपनी कुर्सियों से नदारद थे। लोग घंटों तक खिड़कियों पर झांकते रहे, लेकिन उन्हें जानकारी देने वाला कोई नहीं था। आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारी दोपहर 1:00 से 1:30 बजे के बीच अपने कार्यालय पहुंचे। करीब 4 घंटे की इस देरी ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया, जिससे मौके पर अफरा-तफरी और धक्का-मुक्की की स्थिति पैदा हो गई।

पीड़ितों की जुबानी: मजबूरी और दर्द की दास्तां

विकास भवन में अव्यवस्था का आलम यह था कि बुजुर्गों के बैठने तक की व्यवस्था नहीं थी। हनुमान नगर से आई शहनाज़ बेगम ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया, “मैं सुबह 11 बजे ही यहाँ पहुँच गई थी। मेरे बेटे के दस्तावेजों के संबंध में नोटिस मिला था। हम डर के मारे वक्त पर आए, लेकिन साहब लोग दोपहर 1:30 बजे आए। इतनी भीड़ में सांस लेना मुश्किल हो रहा था, लेकिन कागजात जमा करना मजबूरी है।”

वहीं, पहली खेड़ा से आईं निर्मला की कहानी और भी कष्टदायक थी। उन्होंने बताया, “मैं सुबह 9 बजे से लाइन में खड़ी हूँ। अब पैरों में दर्द हो रहा है, खड़ा होना भी मुश्किल है। अधिकारी 1:30 बजे आए हैं, अब पता नहीं मेरा नंबर कब आएगा। क्या सरकारी दफ्तरों में आम आदमी की कोई कीमत नहीं है?”

बुजुर्गों और महिलाओं की सुरक्षा ताक पर

भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विकास भवन प्रशासन की ओर से कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए थे। कतारों में महिलाओं और बुजुर्गों के लिए न तो अलग से कोई व्यवस्था थी और न ही पानी की सुविधा। धक्का-मुक्की के कारण कई बार बुजुर्ग गिरते-गिरते बचे। लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन को पता था कि इतनी भारी संख्या में लोग नोटिस के जवाब में आएंगे, तो अतिरिक्त पटल (Counters) क्यों नहीं खोले गए?

आक्रोश में जनता: क्या यही है सुशासन?

लाइन में खड़े युवाओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि नोटिस भेजकर डराना तो आसान है, लेकिन जब जनता जवाब देने आती है, तो अधिकारी गायब हो जाते हैं। लोगों ने मांग की है कि ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए जो जनता को घंटों इंतजार कराते हैं।

प्रशासन का पक्ष

जब इस संबंध में विकास भवन के कुछ कर्मचारियों से बात करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कार्य की अधिकता का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लिया। हालांकि, भीड़ और हंगामे को देखते हुए बाद में कुछ सुरक्षाकर्मियों को कतारें व्यवस्थित करने के लिए भेजा गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

निष्कर्ष: उन्नाव विकास भवन की यह तस्वीर बताती है कि डिजिटल इंडिया और सुशासन के दावों के बीच जमीन पर आज भी आम आदमी को अपने हक और कागजी कार्यवाही के लिए घंटों घिसटना पड़ता है। अधिकारियों की कुर्सी प्रेम और समय की बर्बादी का खामियाजा गरीब जनता भुगत रही है।

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